Ujjain Mahkal Darshan - Yatra Vritanta by Sunaina
नमस्कार दोस्तो !
मैं अभी कुछ समय पहले उज्जैन गई थी बाबा महाकाल के दर्शन करने हेतु। वहां जा के बहुत सारी चीजे मेरे समझ के बाहर थी। मैं किसी भी आस्था स्थल को या यूं कहिए की मैं किसी भी धर्म का या किसी भी धार्मिक स्थल का मजाक नहीं उड़ा रही हूं और ना ही मैं किसी की भी धार्मिक भावनाओं को को ठेस पहुंचाना चाहती हूं । मेरी बात इतनी सी है की हम में से न जाने कितने ही दर्शन के लिए जाते है जरूरी नहीं है कि आप उज्जैन ही जाए आप कही भी जा सकते जो भी इस तरह के बहुत प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। वहां आपने देखा होगा की न जाने कितने चढ़ावे आते है जिनमे से पैसा जो की दान पेटिका में जाता है और ना जाने कितने रुपए का दान आता है तो ये दान का पैसा आखिर जाता कहा है और बाबा के दर्शन करने के लिए आपको वहां एक मिनट भी रुकने नही देते है मतलब कुल मिला के अगर आपकी किस्मत अच्छी है तो आपको पर्याप्त एक झलक मिल जायेगी बाबा की अन्यथा आपको तुरंत वहां से बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया जायेगा या यूं कहिए कि आपको तुरंत वहां से हटा दिया जाएगा।
और बाहर मंदिर प्रांगण में ना जाने कितने छोटे छोटे मंदिर है और वहां इतनी भीड़ और वहां न जाने कितने पुजारी बैठे है जो आपको सिर्फ एक छोटा लोटा अभिषेक करने के का 351 रुपए ले ले और अगर नही है तो वही आपको बड़े प्यार से सुना भी देंगे , और सुनिए ये जो बड़े घर के लोग आते है जोकि पैसे वाले भी है इनका अलग ही अपना लेवल चल रहा होता है ऐसे धक्का मुक्की करते है जैसे लगता है की सारी भक्ति आपकी यही उमड़ती है और ऐसा लगता है इनकी भीड़भाड़ को देख के जैसे भगवान अभी बस 1 घंटे भर दर्शन के लिए है बाकी 1 घंटे बाद बाबा यहां से दूसरी और रवाना हो जाएंगे मतलब की वहां जाने के बाद यह एहसास हुआ की सच में इंसानों के पास 1 मिनट का भी समय और सब्र नहीं है दूसरा वहां आपको सिर्फ प्रसाद का ही पैसा जो लगना होगा वही लगेगा बाकी फूल आपको 5 रुपए में मिल जाते है भाई इतने सस्ते फूल जोकि बाबा के पास जाते ही नही है वहीं बाबा के दरबार के आगे जो पंडा या पुजारी बैठे रहते है वो वहीं रख लेते है। मुझे इससे एक बात समझ में आई कि कहीं ऐसा तो नहीं के ये फूल सीधे उन लोगो के पास पहुंच जाते है जो 5 रुपए में फूल में बेच रहे है क्योंकि ये तो बाबा तक गए ही नही और उसमे गिनती के 4 –5 फूल ही होते है क्योंकि आप देखेंगे कि वहां की जो डलिया होती है उसमे वो लोग पॉलीथिन को ऐसे बांध देते है जिसमे इतने ही फूल ही समा पाते है। और ध्यान देने बात ये की आप प्रसाद अंदर की तरफ से ले बाहर से न ले नही तो आपके साथ ठगी करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ेंगे बाकी ओवर ऑल बहुत बढ़िया था आपको बाहर कुछ लोग रुद्राक्ष बेचते मिल जायेंगे तो कृपया कर के उनसे उतना ही मोल भाव कीजियेगा जितना की आपको और उन्हें खराब न लगे क्योंकि दिखावे का पैसा तो दान पेटी में ही दे आएं है।
दूसरा मंदिर है बाबा काल भैरव का भाई साहब वहां रिक्शा वालों का अलग ही कमीशन बना हुआ है वो सवारी प्रसाद के दुकान के आगे उतारते है उसके बाद आपको प्रसाद के नाम पे खूब समझाया जाता है कि ये ऐसा होगा या वो ऐसा होगा मगर जैसे ही आप वहां से प्रसाद लेके मंदिर की ओर चलते हो तो सबसे पहले इतनी भीड़ का सामना करना पड़ सकता जितना की आपको महाकाल में नहीं मिली थी। और मंदिर प्रांगण उतना बड़ा नही है मगर दर्शनार्थियों की वजह से उसमे इतनी बैरिकेडिंग लगा के लाइन बना रखी थी की जिसका कोई जवाब नही और अंदर जाते ही आपका प्रसाद चढ़ जाए बाबा को और आपको तत्काल दर्शन ही मिल जाए ये बहुत बड़ी बात है, और जिसके लिए इतना आपको समझाया गया था प्रसाद को ले के उतना नहीं होता है हां होता भी होगा मगर जब हम गए तो ऐसा बिल्कुल भी नही था।बाकी सब बाबा की माया है जिसमे आप मैं और सब फसें और इसके अलावा सबसे ज्यादा तो पुजारी पंडा और प्रसाद विक्रेता फसे हैं। बाकी दर्शन अच्छे से मिले बाबा की कृपा रही तो फिर आना होगा बाबा की नगरी उज्जैन में। हां दान पेटी में चढ़ने वाले चढ़ावे को ध्यान में जरूर रखे की ये जाता कहां है ?
जय महाकाल बाबा की।
- Sunaina Dhar Dubey ki Facebook Wall Se



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